अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ
दुनिया को यूँ मिटाएगी इक्कीसवीं सदी
- बशीर बद्र
मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया
मैं तिरी राह से हटा ही नहीं
- फ़हमी बदायूंनी
दुनिया है सँभल के दिल लगाना
याँ लोग अजब अजब मिलेंगे
- मीर हसन
ये सारी जन्नतें ये जहन्नम अज़ाब ओ अज्र
सारी क़यामतें इसी दुनिया के दम से हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
आज भी बुरी क्या है कल भी ये बुरी क्या थी
इस का नाम दुनिया है ये बदलती रहती है
- एजाज़ सिद्दीक़ी
थी मिरे दिल की उमंगों ही से दुनिया की बहार
दिल परेशाँ क्या हुआ आलम परेशाँ हो गया
- फ़ाज़िल काश्मीरी
Urdu Poetry: नींद आए तो अचानक तिरी आहट सुन लूँ