अश्कों से भीगे जख़्म,छुपाऊं कब तक।
इस हाल में खुश नजर,आऊं कब तक।।
सोते जुगनुओं को अब,जगाना ही होगा।
उजालों के लिए,दिल जलाऊं कब तक।।
मेरे चेहरे की इबारत , पढ़ने लगे हैं लोग।
दोस्तों के दरम्यां, झूठ चलाऊं कब तक।।
एक मुद्दत से कैद हूं, मैं रस्मों की हद में।
आजाद हूं , खुद से ये बताऊं कब तक।।
ख़ामोशियों में मुझे, आवाज दी किसने।
साये को साथ अपने, जगाऊं कब तक।।
-यूनुस खान
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