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इस कदर

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज इस कदर, ये आंगन वीरान क्यूं है।
        
                                                    
                            
मेरी ही तरह, हर एक शै परेशान क्यूं है।।

वो उन परिंदों के घोंसलों का क्या हुआ।
इसे लेकर,इतना बेचैन ये दालान क्यूं है।।

जहां कल दिये जलाये थे,अंधेरे हैं आज।
ये मंज़र देखकर, दिया भी हैरान क्यूं है।।

ग़म-ए-जुदाई का हर जख़्म, भर गया है।
मगर अभी तक,उनके ये निशान क्यूं है।।

कश्ती को साहिल पे आने ही नहीं देता।
ना जाने, इतना बेरहम ये तूफ़ान क्यूं है।।

कहीं भी जाऊं , दर्द मेरे साथ चलता है।
मुझसे दर्द की , ये जान-पहचान क्यूं है।।

मेरे अपने मुझे देखते हैं, कि गैर हूं जैसे।
अफ़सोस, इतना खुदगर्ज इंसान क्यूं है।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
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