मेरी रूस्वाई से शहर-ओ-बाजार सजे हैं।
इसी मजमून के सहारे अखबार सजे हैं।।
कुछ अरसे को, केद-बाम-ओ-दर था मैं।
देखो , मेरी गुमशुदी के इश्तहार सजे हैं।।
हस्ब-ए-जरूरत,दोस्तों ने दोस्त बदले हैं।
इस फ़न से , दोस्तों के किरदार सजे हैं।।
साहिल के तमाशबीनों को,ये क्या पता।
टूटी कश्तियों से , सारे मंझधार सजे हैं।।
ख़ामोशी से मेरे दर्द का अंदाजा न कर।
देख,मेरी आहों से मेरे अशआर सजे हैं।।
-यूनुस खान