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ऐलान-ए-बेवफाई, अच्छा लगा मुझे

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगरचे, अब चमन में बहार बहुत थी।
        
                                                    
                            
मगर खिजां में भी तेज धार बहुत थी।।

चिराग बुझे तो, तस्कीन हुई दिल को।
उजालों में, तबियत बेकरार बहुत थी।।

वो करीब आये , तो फांसले पटे थोड़े।
वरना हमारे दरम्यां यूं दरार बहुत थी।।

दरीचे बंद करने की क्या ज़रूरत थी।
आंगन में खड़ी हुई , दीवार बहुत थी।।

यूं सन्नाटों से गुफ्तगू हम कर तो लेते।
ख़ामोशियों में चीख-पुकार बहुत थी।।

तेरी आहट से, तुझे पहचान लेते हम।
मगर हवा में, आज रफ्तार बहुत थी।।

जो, आज दरकिनार कर देते हैं मुझे।
कल तक उन्हें मेरी दरकार बहुत थी।।

ऐलान-ए-बेवफाई, अच्छा लगा मुझे।
वरना मेरी वफ़ाएं शर्मसार बहुत थी।।
-यूनुस खान
3 घंटे पहले
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