मैं हूं समाज पहचानो मुझे
बिगड़ रही है आदत मेरी
संभलो मुझे ,
तुम्ही ने सिखाई
रिश्वतखोरी,
तुम्ही ने सिखया
अत्याचार,
बिगड़ तो चुका हूं
अब और न
बिगाड़ो मुझे ,
डगमगा गया हूं
रास्ते से संभलो मुझे ,
मैं हूं समाज पहचानो मुझे ,
बना दिया दलाल
सिखा दिया
गुण चोरी का ,
उठा लिया फायदा
मेरी लचारी
मेरी मजबूरी का,
अब समझ आया
उपयोग तुमने गलत किया ,
मेरे हौसले और
मेरे जुनून का,
आंखों में झूठ का
पर्दा डाल कर
अपने समाज को तुमने खुद भृष्ट किया ,
आईने में देख कर
डर जाता हूं
चेहरा अपना ,
भृष्ट समाज का
भृष्ट रुप जो
तुमने मुझे दिया ,
पर अब तुमसे
नही डरूंगा ,
भृष्ट समाज के खिलाफ
में लड़ूंगा क्योंकि,
में खुद समाज हूं
पहचानो मुझे ,
बिगड़ रही है आदत मेरी संभलो मुझे।
Yogendra kharwar.