क्यों टूटा, क्यों बिखरा,
सम्भाल सका न कोई।
टूटता रहा मैं भीतर-भीतर,
रोक सका न कोई।
चेहरे पर हँसी थी मेरी,
दर्द पढ़ सका न कोई।
भीड़ खड़ी थी चारों ओर,
पर अपना लगा न कोई।
ख़ुद से ही लड़ता रहा मैं,
मेरा पक्ष ले सका न कोई।
चीख़ता रहा ख़ामोशी में,
सुन सका न कोई।
अब जोड़ूँ भी तो कैसे ख़ुद को,
जब जान सका न कोई।
मैं गिरता रहा अपनी नज़रों में,
और देखता रहा—
मुझे थाम सका न कोई।