आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सम्भाल सका न कोई

                
                                                         
                            क्यों टूटा, क्यों बिखरा,
                                                                 
                            
सम्भाल सका न कोई।
टूटता रहा मैं भीतर-भीतर,
रोक सका न कोई।
चेहरे पर हँसी थी मेरी,
दर्द पढ़ सका न कोई।
भीड़ खड़ी थी चारों ओर,
पर अपना लगा न कोई।
ख़ुद से ही लड़ता रहा मैं,
मेरा पक्ष ले सका न कोई।
चीख़ता रहा ख़ामोशी में,
सुन सका न कोई।
अब जोड़ूँ भी तो कैसे ख़ुद को,
जब जान सका न कोई।
मैं गिरता रहा अपनी नज़रों में,
और देखता रहा—
मुझे थाम सका न कोई।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर