ये जंग कितने दिन बुरी खबर सुनाएगी ,
ये जंग कितनों को कबर में सुलाएगी ।
दरके-दरके घर शहरों में
सहमें-सहमें लोग घरों में,
न जाने किस पल छप्पर इनके उड़ाएगी,
ये जंग कितनों को कबर में सुलाएगी ।
खरीद सकते हैं मगर सामान नहीं
कहाँ से लाये खुली कोई दुकान नहीं ,
न जाने कब तक लोगों को तरसाएगी ,
ये जंग कितनों को कबर में सुलाएगी ।
कितनों की गोद और सुहाग उजड़ेगा
कितने बच्चों का भाग्य बिगड़ेगा ,
दुनिया जंग की गुत्थी कब सुलझाएगी ,
ये जंग कितनों को कबर में सुलाएगी ।
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