जंग ने उजाड़ दिया मेरे बसेरे को ,
सिर छुपाने ढूंढ रहा मैं एक डेरे को ।
एक-एक ईंट को बरसों जमाया
इसे बनाने मैंने बरसों कमाया ,
पल में बिगाड़ दिया मेरे बसेरे को ,
सिर छुपाने ढूंढ रहा मैं एक डेरे को ।
कितने अरमान कितने ख़्वाब सजाए
कितने दिन सुहाने कितने साँझ बिताए ,
कहाँ ले जाये अब दिन के अंधेरे को ,
सिर छुपाने ढूंढ रहा मैं एक डेरे को ।
जानता नहीं मैं किसे क्या होगा हासिल
मेरा तो दरिया में ही डूब गया साहिल ,
कौन रोकेगा अब बरबादी के फ़ेरे को,
सिर छुपाने ढूंढ रहा मैं एक डेरे को ।
यतिराज कुमारी बजाज “प्रेरणा”
हैदराबाद
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