मैं कभी कह न सका तुमसे
कि कितनी मोहब्बत है मुझे तुमसे,
तो मैंने तुम्हारे लिए
खाना बनाना सीख लिया।
मैं कभी छूकर जता न सका
कि कितनी फ़िक्र रहती है
मुझे तुम्हारी,
तो मैंने तुम्हारे थके हुए पाँव
दबाना सीख लिया।
मैं कभी बता न सका
कि तुम्हारी हँसी मुझे
कितनी ख़ूबसूरत लगती है,
तो मैंने तुम्हारी छोटी-बड़ी हर ख़्वाहिश
पूरी करना सीख लिया।
और फिर एक दिन यूँ हुआ,
कि तुम्हें समझने, तुम्हें चाहने
और तुम्हें महसूस करने की चाह में,
मैं धीरे-धीरे तुम बन गया।
- वासिफ़