जब मैं था, अँधेरे में थी ज़िन्दगी मेरी
अब मैं नहीं हूँ, पर समयहीन हो गई ज़िन्दगी मेरी।
मैं अपने को वर्षों ढूँढ़ता रहा,
पर कभी स्वरूप नहीं दिखा पाई ज़िन्दगी मेरी।
वेदों की ऋचाओं से महापुराणों के शब्द-सागरों तक,
पर कोई किताब नहीं बन पाई ज़िन्दगी मेरी।
हिमालय की ऊँची शिखरों से गंगा की उपत्यका तक,
पर कोई संगीत नहीं बन पाई ज़िन्दगी मेरी।
बड़े हिमखंडों से लेकर विशाल जलाशयों तक मैं ढूँढता रहा,
पर कभी प्यास नहीं बुझ पाई ज़िन्दगी मेरी।
वर्षों से सपनों में चाँद-सितारों की सैर करता रहा,
पर कोई हक़ीक़त नहीं बन पाई ज़िन्दगी मेरी।
श्मशान घाटों की बीरान भूमि से शैतानों की आयतों तक,
पर कोई ताबीज़ नहीं बन पाई ज़िन्दगी मेरी।
फिर अपने को अपने में ही ढूँढा मैंने,
तब वक़्त गुज़र चुका था —
न मैं रहा, न मेरी परछाईं,
और अधूरी रह गई ज़िन्दगी मेरी।