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किस्सा ' जब सवालों पर लाठीयां चली !

Vishwajeet Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब किताब और कलम छोड़कर,
        
                                                    
                            
सड़क पर उतर आयें विद्यार्थी,
तो लगा था शायद लोकतंत्र,
अपने ही बच्चों की सुनेगा आज ।

मगर उतर में मिली लाठियाँ,
आँसू गैस की गोलें और,
वॉटर कैनन की बौछारें,
और 'घायल होता '' संविधान "।

जिस हाथ में संविधान ले निकले थे,
उन पर डंडो का भार क्यों ?
जो जबाबदेही माँगने निकले थे,
उन पर आँसू गैस की गोलाएँ क्यों?
क्या लोकतंत्र अपने ही बच्चों से घबरा गया ?

माना, सवाल पूछने से डरने वाली सरकारें,
हमेशा यही हथकंडे अपनाती है,
मगर, इस्तीफें की माँग तो,
लोकतंत्र में कोई गुनाह नहीं !

याद रखना ये ' सत्ता के शेर ',
'डंडे'से विश्वास नहीं जीता जाता।

जिस भारत माता की कसमें खाते हो,
आज उस माँ की भी आखें नम होंगी।
सुनो सत्ताधारियों,
छात्रों के शरीर पर बजी, हर एक लाठी,
के पतन की तरफ इशारा करेगी ।

जिन कंधों पर, माँ बाप के सपनो का बोझ था,
उन्हीं कंधो पर, डंडो की चोट क्यों रख दी गई ?
क्या लोकतंत्र में,
'संविधान' समझाने का नया तरीका है?

ये आंसू गैस जब छोड़ी जाती है, न
तो सिर्फ छात्र बेहाल होकर नहीं रोते,
रोती है लोकतंत्र की 'आत्मा '।
रोती हैँ माँ भारती।

क्या सता की ताकत, अब तर्क से नहीं,
लाठीयों की, गिनती से मापी जाएगी?
तो सताधारियों, याद रखना जब एक छात्र तड़पता है,न!
तो उसके साथ तड़पती है,
उसकी उम्मीदें, उसके सपने, उसका विश्वास।

हर एक लाठी जो छात्र पर गिरती है,
वो लोकतंत्र के माथे पर नया कलंक दे जाती है।
-सौर्य सरकार
4 घंटे पहले
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