तुम कब समझोगे प्यारे, जब मिट जाएंगे सारे!
जब मिट जाएंगे सारे, तब रहना अकेले, झूठी शान लेकर प्यारे।
धरा को निर्जन बना, खूब हँसाना प्यारे,
अकेले बिचरना, मन में लेकर अहंकार सारे।
स्वधर्म को ही ऊँचा समझ, जन की बलि देना प्यारे,
फिर निष्कंटक राज तुम्हारा होगा, धरती पर सारे।
पैर पसार अकेले ही, सुख भोगना प्यारे,
जब धरा पर न रहेंगे, जीव-जंतु सारे।
खाली पोटली जाति-धरम की, ले जग घूमना प्यारे,
धर्म नहीं, जाति नहीं, कर्म ही जीवन को संवारते सारे।
जीवन के सत्कर्म निर्धारित करते, सौभाग्य हमारे सारे।
स्वभाषा को सर्वोपरि मान लेना प्यारे,
पर क्या भाषा, बिना कर्म के देती जीवन के सुख सारे?
पर्वत काट, दूषित कर नदियाँ, मौसम बदल दो सारे,
खोजना फिर शुद्ध हवा-जल, बयार और बसंत सारे।
ऊँचे भवन बना, पथरीली कर दीं राहें,
कहीं पग में माटी न लग जाए प्यारे!
नफरत के बीज बो दो, खेती में धरती के सारे,
फसल भी तो वही काटोगे, मिलकर कल सारे।
आज अपनी ही नासमझी से, हम उजाड़ रहे अपना कल,
मासूम तरसेंगे साँसों को, जब हवाओं में घुलेगा ज़हर।
लूटकर आँचल प्रकृति का,खतम साधन सारे,
सिसकती और रोती धरती, क्या यही देंगे हम बच्चों को कल?
धरा को वीरान कर, दूजा ग्रह खोज लेना प्यारे,
पर क्या खाओगे, क्या पीओगे, क्या जियोगे, धरा वीरान कर सारे?
समझा गए राम, कृष्ण, यीशु, बुद्ध और पीर-मोहम्मद सारे,
कर्त्तव्य को धर्म समझ, कर्म को पूजा मान, मिलकर रहो सारे।
रोती है इंसानियत आज, जब लहूलुहान होते देख रही मंजर सारे।
बाँट दिया उस रब को भी, बना मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर सारे,
भूल बैठे मानवता , बस पूज रहे अपने अहंकार सारे।
गर ईश को जानते, तो क्यों भटकते मंदिर-मस्जिद सारे?
सिसक रहा है वो खुद पत्थरों में,
क्यों मिली न जगह दिलों में, इंसा के सारे !
स्वयं को जान न सके, सब जानने का दावा करते सारे,
उस विधाता को भला क्या जानोगे, बनाया जिसने यह जहाँ सारे!
-विश्वमनु