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गुड़िया का मन ऊब गया था

Vishal Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्र हुई क्या, कुछ करने की,
        
                                                    
                            
लोग हुए परेशान।
भोला के गुड़िया को देखो ,
कैसे हुई जवान।

उधर गुड़िया सोच में थी,
छूने को आसमान।
इधर उसके पांव तले था,
शादी का शमशान ।

जीवन की शुरुआत ही थी,
तालीम अभी ना कुछ पाई ।
खुशियों की बरसात ही थी,
कुछ दुनियां से ना पूछ पाई।

एक दिन भोला बैठा था ,
गाँव के चौपाल पे।
इतने मे झगरु काका आ,
बैठे धोती संभाल के ।

बिटिया तेरी बड़ी हो गई,
क्या तुमने कुछ सोचा है।
शादी कर दो समय से ,
या ,इसमें भी कुछ लोचा है।

कभी रुठ गई मैं मां से तो,
तुम खुद से मुझे खिलाओगे।
अगर आई मैं प्रथम तो,
क्या  गिफ्ट मुझे दिलाओगे।

पापा  एक  दिन  देखना ,
सपनों की सीढ़ी चढ़ना है।
काका  गुड़िया  कहती है,
 मुझे अभी तो  पढ़ना है।

अपना ओहदा देख लो तुम,
कब तक इसे पढ़ाओगे।
रोटी तो  इसे  बनानी  है,
कलक्टर  नहीं  बनाओगे।

दहेज भी देना है तुमको,
या नर्तक नहीं नचाओगे ।
बेटा भी तो है तेरा ,
क्या उसके लिए बचाओगे?

बेटी  धन  पराई  है,
इस बात को तुमने जाना ना !
वो ग़ैरों की अमानत है,
अब तक तुमने पहचाना ना ।

उम्र का  है तजुर्बा मुझको,
इसलिए तुझे समझाता हूं।
सोच समझ कर निर्णय लो,
वक़्त  हुआ  मैं  जाता  हूं।

भोला के मन में अब उठा ,
सवालों का समंदर।
मन से आया कुछ बाहर ,
कुछ रहा मन के अंदर।

अंतर्मन के निर्णय से ,
भोला ने अब ये सोच लिया।
कुंठित मन को चंचल कर,
माया का आँसू पोछ लिया।

उधर गुड़िया दौड़ी आई,
अरमानों के बारात लिये।
इधर भोला चलकर आया,
बस शादी का सौगात लिये।

पापा मैं तेरी गुड़िया हूं,
किसने कहा पराई हूं ।
हँस कर गुड़िया कहती है,
देखो  मैं  प्रथम  आई  हूं।

जैसे भवरों के किस्मत से,
पुष्पों के कलियाँ फूल गए।
वैसे लगता है मुझको, मेरे ,
भाग्य के ताले खुल गए।

याद है या भूल गए,
तुमने किया कुछ वादा है।
गिफ्ट देने को सोच रहे,
या  बदला तेरा  इरादा  है।

मैं ना मांगू धन और दौलत,
ना चांदी ना सोना।
मुझको देना अपने दिल मे,
प्यार भरा एक कोना।

सपनों की सीढ़ी चढ़ना है,
ये  सामने  तेरे हल्दी क्यूं।
पापा मुझको तो पढ़ना है,
ब्याह की इतनी जल्दी क्यूं।

इतना सुनकर भोला के,
आंखों से  आंसू छूट गए।
अब तुम ब्याही जाओगी,
समझो सपने सब टूट गए।

शादी तो मैं खुद भी कर लूंगी,
नदिया पार निहाल से ।
लेकिन मैं बेटी क्षुब्ध रहूंगा,
दुनियां  के   सवाल  से ।

कर्ज मेरा है तुझ पर,
मैंने तुझको पाला है।
शादी के लिए हा कह दो,
या सामने विष का प्याला है।

इतना  सुनकर गुड़िया ने,
सपनों को अपने घूंट गई।
शादी के लिए हा कर दी,
और अंतर्मन से टूट गई।
           
वक़्त गुजरा कुछ आई फिर,
भोला के घर बारात।
कर्ज़ हुआ कुछ इससे क्या,
बेटी से हुआ आजाद।

गुड़िया की अब हुई विदाई,
जा पहुंची ससुराल।
स्वागत हुआ धूमधाम से,
और गूंजी करताल ।

इतने मे सासू मां आई,
बोली सबकुछ तुम रहने दो।
संभाल   के  रख  दूं सबको,
जो तुम लाई हो गहने दो।

अपनी नई इस दुनियां का,
गुड़िया ने किया सम्मान।
इसी मां के हाथ में था ,
अब जीवन का कमान।

गहने देख कर मां बोली ,
इसमें कहां है टीका ।
बाप तेरा भिखमंगा  है,
मेरा बेटा हो गया फीका।

अब गुड़िया के मन मे उठे,
कितने नये सवाल।
फिर भी वो कुछ कह ना पाई,
हो ना कहीं बवाल।

एक दिन घर में था ना कोई,
गुड़िया को मिल गया मौका।
फिर पापा को फोन लगा,
इस बात पे उसने टोका।

पापा मैं अपने घर आऊंगी,
यहां ना मुझको रहने है।
इंसानों का है मोल नहीं ,
इंसान से ऊपर गहने है।

तुम तो अबला नारी हो,
कुछ दुःख तुम्हें तो सहना है।
देखो,मेरा सर झुके ना,
तुमको वहीं पे रहना है।

गुड़िया का मन ऊब गया था,
रोज रोज के ताने से।
कोई यहां ना समझा उसको,
फिर क्या गिला जमाने से।

एक दिन सासु मां गई,
पड़ोसियों के पास।
फिर गुड़िया फंदा लगा,
पलभर में हो गई लाश।

बेटी बेटा में फर्क था क्या,
तुम खोलो मन की पेटी।
अब भोला समाज से जाकर,
मांगो अपनी बेटी को ...
                  - विशाल आर्या 
2 सप्ताह पहले
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