सीधे, सरल से शब्द को कुंठाओं के बेड़ी में बाँध दिया,
कभी घोंट गला, कभी मोमबत्तियों से इसको नाप दिया।
यौन, हिंसा, पीड़ित, शोषण, ढोंग, बस यही उपनाम दिया,
ये स्त्री, वो पुरुष, इंसानो को इंसान कहना क्यों त्याग दिया?
प्रकृति, ईश्वर, इंसान, देखो हमने सब कुछ तो बाँट दिया,
किसी को स्त्री, किसी को पुरुष, किसी को विकार समझ छांट दिया।
रंग - रूप, अमीरी-गरीबी, लिंग -भेद - विच्छेद, क्यों?
हवा, धूप, जल, थल, नभ, जीवन, मृत्यु, सब तो समान,
फ़िर क्यों मानवता को मानव से ही काट दिया?
किसी को उपवस्त्र कहा, किसी को शासन विस्तार दिया,
पुरुष दिखता स्त्री के वेश में, किन्नर कह तिरस्कार दिया,
क्यों समानता के बदले असमानता का श्राप दिया?
आसान समान समझना जिसने मानवता को जान लिया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।