"पराली और दिल्ली"
फसल कटी है,आई सर्दी,
और फिर जली पराली।
बने धुएं के गहरे बादल,
आ पहुंचे फिर दिल्ली।
लगातार है जलती पराली,
बनते रोज धुएं के बादल।
चलते बढ़ते आते रहते,
लगातार दिल्ली के आंचल।
पर्यावरण प्रदूषित होता,
दिल्ली फिर होती बेहाल।
एक बार की बात नहीं है,
ऐसा होता साल दर साल।
जैसे जैसे सर्दी बढ़ती ,
प्रदूषण होता बद से बदतर।
बनती ऐसी विकट परिस्थिति,
होता सांस लेना भी दूभर।
चर्चाओं के दौर है चलते,
होती सरकारों में जंग।
कोर्ट कचहरी भी जाते हैं,
ढूंढें कुछ राहत का ढंग।
"गुरु जी"कहती है सरकार
तभी फिर,रहो घरों के अंदर।
पराली से पर्यावरण बेहाल,
प्रदूषण गहरा, फैला बाहर।
वीरेन्द्र कुमार
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