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तुझे सोचने का मज़ा कुछ और है

Vinod H.

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जनता हूँ तू मुक़द्दर नहीं मेरा कोई और है
        
                                                    
                            
पर तुझे सोचने का मज़ा कुछ और है

सींचा है जिस चमन को मैंने खूँ पसीने से
मैं नही गुलिस्तां का माली कोई और है

बड़ा है गगन तेरा है गगन में लाखों पंछी
मत बसर कर तेरा घोंसला कहीं और है

उठा ख़ंजर के खडा हूँ दिल लेकर
ख़त्म कर रंजिश तेरा रक़ीब कोई और है

है दिलफेंक अपनी मौत मर गया होगा
गुनाह हुस्न का नही क़ातिल कोई और है

एक अरसे से सोया नहीं है 'शहीद'
मर्ज़ दिल का नहीं मांजरा कुछ और है

- विनोद यादव 'शहीद'


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6 वर्ष पहले
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