जनता हूँ तू मुक़द्दर नहीं मेरा कोई और है
पर तुझे सोचने का मज़ा कुछ और है
सींचा है जिस चमन को मैंने खूँ पसीने से
मैं नही गुलिस्तां का माली कोई और है
बड़ा है गगन तेरा है गगन में लाखों पंछी
मत बसर कर तेरा घोंसला कहीं और है
उठा ख़ंजर के खडा हूँ दिल लेकर
ख़त्म कर रंजिश तेरा रक़ीब कोई और है
है दिलफेंक अपनी मौत मर गया होगा
गुनाह हुस्न का नही क़ातिल कोई और है
एक अरसे से सोया नहीं है 'शहीद'
मर्ज़ दिल का नहीं मांजरा कुछ और है
- विनोद यादव 'शहीद'
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