रेत फिर भी
हो जाये शायद
मुट्ठी में कैद
जवानी नहीं होती
मुलाकातें बहोत
होती हो 'शहीद'
हर मुलाकात
आगाज-ए इश्क़
नहीं होती
कभी बांध सका हो
बहाव गँगा का
शरों से कोई
पर दास्ताने-ए-इश्क़
अल्फाजों की
दासी नहीं होती
हम कह गए नज़र से
वो सुन लिए नज़र से
ये पाक मोहब्बत है साहब
मोहब्बत की कोई
ज़वानी नहीं होती
-विनोद यादव 'शहीद'
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