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गज़ल:- हुनर ही न आया

Vinod H.

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आसमाँ में फिर वो क़मर ही न आया
        
                                                    
                            
हमें ग़म को भुलाने का हुनर ही न आया

लाख सायें थे राहों में सुस्ताए कैसे
जो अपना लगे वो शज़र ही न आया

भरा तरकश था हमारा जब पहुंचे समर में
जो बचा सके सीना सिपर ही न आया

लाख आये ज़माने में इल्म वाले
बाद इद्रीस सा कोई खिज़र है न आया

शिताब करे ज़माना कू-ए-अबस को
एक मुझ सा ख़ुद निगर ही न आया

हम पलकें बिछा के खड़े उनकी राहें
जो मुड़के देखें वो पहर ही न आया

दिल धड़का नहीं तब से सीने में उसके
'शहीद' जब उसको ख़बर दे के आया

विनोद यादव 'शहीद'


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6 वर्ष पहले
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