आसमाँ में फिर वो क़मर ही न आया
हमें ग़म को भुलाने का हुनर ही न आया
लाख सायें थे राहों में सुस्ताए कैसे
जो अपना लगे वो शज़र ही न आया
भरा तरकश था हमारा जब पहुंचे समर में
जो बचा सके सीना सिपर ही न आया
लाख आये ज़माने में इल्म वाले
बाद इद्रीस सा कोई खिज़र है न आया
शिताब करे ज़माना कू-ए-अबस को
एक मुझ सा ख़ुद निगर ही न आया
हम पलकें बिछा के खड़े उनकी राहें
जो मुड़के देखें वो पहर ही न आया
दिल धड़का नहीं तब से सीने में उसके
'शहीद' जब उसको ख़बर दे के आया
विनोद यादव 'शहीद'
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