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अजनबी मोड़ और बारिश की कुछ भुली बिसरी यादें

Vinita Tirpude

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इन ढलती शामों में आज भी तुम्हारी यादें
        
                                                    
                            
दिल के एक कोने में मैंने कहीं महफ़ूज़ रखी हैं।

बारिश की मिट्टी में आज भी तुम्हारी ख़ुशबू मौजूद है,
इन बहती ठंडी हवाओं में आज भी तुम्हारी छुअन महसूस होती है।

यूँ तो रोज़ होती है तुम्हारे पास वापस लौट आने की आरज़ू,
पर आज भी मेरे क़दम ठहर जाते हैं—
तुम्हें क्या पता, मेरी भी तो कोई मजबूरी है।

बस हर दिन निहारती हूँ मैं इन चाँद-तारों में तुम्हारा ही एक अक्स,
तुम्हारा ज़िक्र आज भी मेरी महफ़िलों में जब भी होता है,
मेरा ये दिल फिर एक बार ज़ोर से धड़क उठता है।

तुम इस तरह शुमार हो मेरी हर इबादत में,
कि तुम्हारा ही एक नाम शामिल है मेरी हर दुआ में।

 
8 घंटे पहले
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