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अजनबी मोड़ और बारिश की कुछ भुली बिसरी यादें

                
                                                         
                            इन ढलती शामों में आज भी तुम्हारी यादें
                                                                 
                            
दिल के एक कोने में मैंने कहीं महफ़ूज़ रखी हैं।

बारिश की मिट्टी में आज भी तुम्हारी ख़ुशबू मौजूद है,
इन बहती ठंडी हवाओं में आज भी तुम्हारी छुअन महसूस होती है।

यूँ तो रोज़ होती है तुम्हारे पास वापस लौट आने की आरज़ू,
पर आज भी मेरे क़दम ठहर जाते हैं—
तुम्हें क्या पता, मेरी भी तो कोई मजबूरी है।

बस हर दिन निहारती हूँ मैं इन चाँद-तारों में तुम्हारा ही एक अक्स,
तुम्हारा ज़िक्र आज भी मेरी महफ़िलों में जब भी होता है,
मेरा ये दिल फिर एक बार ज़ोर से धड़क उठता है।

तुम इस तरह शुमार हो मेरी हर इबादत में,
कि तुम्हारा ही एक नाम शामिल है मेरी हर दुआ में।

 
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6 घंटे पहले

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