बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
भस्म कर दो इन राक्षसों को
क्यूं मुख छिपाए बैठी हो
क्यूं करती हो इनसे विनती
जो बने हैं पत्थर की मूर्ति
चीर दो उस हृदय को जहाँ वासना रहती है।
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
अब न आयेंगे नरायण बचाने
अब न आयेगें कोई राम
क्यूं ये पीड़ा सहती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
सह न सके जो अत्याचार
उन्हें भी दे दो तुम तिरस्कार
दिखला दो भरी सभा को
तुझमे जो शक्ति रहती है
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
मानवता बिक चुकी है
कोई नही है सिरूदधार
दुर्गा को उतार लो खुद में
क्यू शेरनी न बनती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
कर्ण की जीभ काट लो
व्यंग जो तुमपे करती है
उठो खड़ी हो द्रोपदी
क्यु खुद में सुलगती रहती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
काट दो हाथ दुशासन के
जो तुम्हे अपवित्र करते हैं
तुम इससे क्यूं डरती हो
बहुत आग है तुझमें द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
उठो खड़ी हो लो प्रतिकार
दिखलादो उनको अवतार
क्यूं न प्रतिकार तुम करती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
छोड़ दो इन दुष्टों को
जो तुम्हें बेचते रहे हैं
छीन लो अधिकार इनसे
इतना क्यूं सोचती रहती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
दुर्योधन का मुँह नोच लो
उसको कर दो बिन सिर पैर
रिश्ते की मान छोड दो
क्युन तलवार उठाती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो
शकुनी की आँख फोड़ दो
घात जो तुमसे करती है
पासे को लात मार दो
क्यूं खड़ी सिसकती रहती हो
बहुत आग है तुझमे द्रौपदी
क्यूं सर झुकाए बैठी हो