चलते-फिरते
जीते-मरते
कई बार देखा हूँ
आदमी राह चलते मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा,गिरजाघर देख कर शीश-नवाजी करता है
मतलब सिर झुका कर प्रणाम करता है
जरा बताइए
झुका हुआ सिर
अपने प्रायश्चित और आत्मीक अध्यात्म का आत्म समर्पण होता है --क्या
हमें लगता है
आदमी का सिर कई बार शर्म से भी झुक जाता है
यह फर्क नही कर पा रहा हूँ
सिर झुकाने से आदमी किस तृप्त को पा लेना चाहता है
या फिर सिर झुकाना
एक बेहद आत्म कुंठित और स्वार्थ-साधना का माध्यम है
केवल और केवल !