जरा देखो!वक्त के गुलजार
लिहाजा नहीं मनुष्य को
प्रकृति कल तक खुश थी।
परन्तु आज कुछ-कुछ
यूँ नजर लग गई।
यूँ उस परिदों की जो
अपने को कर्ता समझ
कर हमें ठगा दिया
मेरे भी कान-भरे
किसी ने
कल तक मैं रो रही थी।
मेरा दर्द न समझा
किसी ने.............प्रकृति
लेकिन आज तुम रो रहें हो
कोरोना
जीव बड़ा दुखी हैं
स्वयं निकला था वह विश्व विजय के गढ़ को फतह करने ।
पापी वह विश्वव्यापी स्वयंमितघाति
अरें ! उसके न लगती छुरी छाती में
कहें विक्रम राजपुरोहित मूर्ख[शत्रु]
भला क्या समझे लिहाजा!
उसे तो दुह भाँति राजी राख्यो पर!
आज वह शक्ल विश्व विश्वासघाती...??
पढ़ा हमसें कुछ ज्यादा पाठी ।।
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