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शहनाइयों में सिसकता इश्क़

Vikash Tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इश्क़ भले मेरा मुकम्मल न हुआ हो कभी,
        
                                                    
                            
पर यारों की शादियों में पंडाल बहुत लगाए हैं मैंने।
किसी के हाथों में मेहँदी, किसी की माँग में सिंदूर था,
अपने हिस्से में मगर हिज्र के साए ही पाए हैं मैंने।
वो किसी और की होकर भी मुस्कुराती रही उम्र भर,
उसकी यादों के चराग़ अश्कों से जलाए हैं मैंने।
लोग कहते हैं कि मैं महफ़िल में बहुत हँसता हूँ,
कितने मातम अपनी हँसी में छुपाए हैं मैंने।
किसी दूल्हे को सेहरे में देख दिल ये सोचता रहा,
कितने ख़्वाब अपनी पलकों से दफ़्नाए हैं मैंने।
जब भी निकली किसी दोस्त की बारात गली से मेरी,
अपने अरमानों के जनाज़े ख़ामोशी से उठाए हैं मैंने।
वो जो कहती थी कि तेरे बिन न जी पाएँगे हम,
उसी के बिन कई मौसम बिताए हैं मैंने।
एक घंटा पहले
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