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ख़ुद की पहचान

Vikas Upadhyay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कसक जो मुहब्बत से आई हुई है
        
                                                    
                            
कलम मैंने उस पर चलाई हुई है
भले मेरी पहचान! छोटी हो कितनी?
मगर अपनी ख़ुद की बनाई हुई है 

शौकत-ए-शान कमाने में वक्त लगता है
समय की मांग सजाने में वक्त लगता है
ये झूठी शान, नुमाइश, नफ़स का धोखा है
ख़ुद की पहचान बनाने में वक्त लगता है
-विकास उपाध्याय 'वैभव'
 
2 महीने पहले
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