कसक जो मुहब्बत से आई हुई है
कलम मैंने उस पर चलाई हुई है
भले मेरी पहचान! छोटी हो कितनी?
मगर अपनी ख़ुद की बनाई हुई है
शौकत-ए-शान कमाने में वक्त लगता है
समय की मांग सजाने में वक्त लगता है
ये झूठी शान, नुमाइश, नफ़स का धोखा है
ख़ुद की पहचान बनाने में वक्त लगता है
-विकास उपाध्याय 'वैभव'
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