तुम मेरी कविता में बसती
चित चिंतन में तुम ही बसती
साहस में तुम
सामर्थ्य में तुम ही
प्रेम में तुम
हर अर्थ में तुम ही
ध्यान में तुम
दर्शन में दिखती
मन मुस्काती बरबस हंसती
तुम मेरी कविता में बसती
तुम तपती गर्मी की प्यास
औ रिमझिम सावन की आस
धवल चंद्र की
शीतलता तुम
जब तुम
मन कैसे उदास
ओस भोर की
मोती बन बिछती
वन उपवन में मेरे खिलती
तुम मेरी कविता में बसती
-विकास मोहन गुप्ता