वेदना रहित यदि
जीवन हो जाएगा
न सुख का हर्ष
न दुःख की पीड़ा
श्वेत धवल ,
चहुं ओर सतत
सत्व केवल
मकरंद गंध से
रहित पुष्प
मधुवन का फिर
श्रृंगार कहां
अखिल प्रकाशित
व्योम धरा ,फिर
नक्षत्रों का हार कहां
श्रेय प्रेय की
कामना नहीं
वृत्ति रहित चित्त
स्थिर केवल
किंतु, कौन फिर गीत
मधुर प्रेम के गाएगा