हे शांति निकेतन प्रेम शिंधु एक आशा मेरी पूरी कर दे।
हमने जो दिए जलाए हैं उनमें सास्वत ज्योति भर दे।
ये दिए हमेशा जले रहे आंधियों से लड़ने की हो क्षमता।
उत्कृष्ट ये दीपक ऐसे हो किंचित न कर सके कोई समता।
निश्छल निष्कपट ज्योति लिए मिटाएं अज्ञानता का प्रदूषण।
सुत एक कुल का उजियारा है ये तो दोनों कुल का आभूषण।
ये जिस भी घर में जाएं उस घर को ये रोशन कर दें।
दुःख दारुण सारे जाएं भाग ऐसा माहौल पैदा कर दें।
मेरी छात्राओं के जीवन में हर रोज दिवाली हो जाए।
विद्या अर्जन समझें एक लक्ष्य ऐसी उनमें बुद्धि आए।
नित नए सफर करने वाली कश्तियां ही डूबा करती हैं।
बस इसी सोच में कवियों की जिभ्याएं डूबा करती हैं।
जीवन का मार्ग बड़ा है कठिन कब किसने कितना कह पाया।
हम तुच्छ और हैं बहुत निम्न कुछ शून्य मात्र ही कह पाया।
दुनिया में ज्ञान असीमित है मैं कैसे क्या बखान करूं।
बहुतेरे यहां से चले गये उनके पद चिन्हों को पकरूं।
थोड़ा अब होश संभाला है चलने की अब कोशिश करता हूं।
कितना मैं अब चल पाऊंगा बिन बिचारे चलता रहता हूं।
द्वारा बी पी सिंह यादव मैनपुरी
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