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आपातकाल

Vijay Prabhakar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ राते इतनी अंधियारी थी
        
                                                    
                            
काजल बन जाता
समय ऐसा भी आया था
कुछ भी नहीं बचता,

तूफान ऐसा उठा था,
पतवार छूट जाती
तुन्द लहरों ने ऐसा घेरा था
जीवन नाव बच नहीं पाती

पागल बनकर कहीं बहक जाता
इतना नहीं था ध्यान
जलकर भस्म होता
किसी भी क्षण

हर दांव हार जाता था
मन करता फेक दूँ दाव
दिल पर इतने पड़े थे घांव
सोचता छोड़ दूँ तेरा गांव

कैसे निभाया कुछ पता नहीं
समझ आता नहीं था
मेरे पास कुछ नहीं था
सिर्फ तेरा हाथ मेरे हाथों में था।

~ कवि अनिल
मूल मराठी कविता 'आणीबाणी' का हिंदी अनुवाद - विजय नगरकर
21 घंटे पहले
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