नारी का अपमान और काल का आह्वान
इतिहास गवाह है धरती का, जब-जब अभिमान हुंकार भरा,
जिसने भी कुदृष्टि डाली यहाँ, वह वंश सहित पाताल गिरा।
सतीत्व की अग्नि सुलग उठी, तो बड़े-बड़े साम्राज्य मिटे,
मर्यादा को जो भूल गए, उनके ही शीश धड़ से है कटे।
खड़ा गवाह है रावण का, वह सोने का संसार कहाँ?
सीता पर जिसने हाथ धरा, उसका कुल-वंश और नाम कहाँ?
अहंकार में डूबा लंकापति, पल भर में धूल में मिल बैठा,
नारी का जिसने अपमान किया, वह काल के मुख में जा बैठा।
दुर्योधन ने भी भूल करी, भरी सभा में चीर बढ़ाया था,
कुरुवंश के विनाश का कारण, उसने खुद ही बनाया था।
महासमर की वह कुरुक्षेत्र की, रक्त-रंजित माटी बोल रही,
नारी के अपमान की कीमत, हर एक युग में तौल रही।
खिलजी की वह क्रूर वासना, जौहर की लपटों में राख हुई,
राजपूती आन की खातिर ही, पद्मावती खुद ही पावन आग हुई।
जीत के भी वह हार गया, मिट गया नामो-निशान उसका,
नारी के तेज ने भस्म किया, वह झूठा सब सुल्तानपना।
आज फिर वही इतिहास खड़ा, चित्कार उठी है माटी से,
श्रीगंगानगर की इस घटना ने, दिल चीर दिया है घाटी से।
एक निर्दोष की चीख ने फिर, सोए समाज को झकझोरा,
अन्याय की इस काली रात का, कब चमकेगा नव भोर जरा?
क्या भूल गए हम संस्कारों को, क्या भूल गए उस मर्यादा को?
क्यों बार-बार हम सहते हैं, इस वहशीपन की बाधा को?
यह भूमि नहीं सह सकती अब, इन दुष्टों का अत्याचार यहाँ,
अब न्याय की तलवार उठे, और थर-थर कांपे पापी जहां।
हे शासन! हे न्यायधीश! अब ढील नहीं, हुंकार करो,
जिसने मर्यादा तार-तार की, उस दानव का संहार करो।
श्रीगंगानगर की बेटी को, जब तक न्याय नहीं मिल जाता,
यह देश नहीं सो पाएगा, यह इतिहास यही बात बतलाता।
कुल के कुल मिटते देखे हैं, तुम इस चेतावनी को याद रखो,
नारी की अस्मत पावन है, इसका हर हाल में मान रखो।
अब और न कोई द्रोपदी हो, अब और न कोई सीता रोए,
जागो ऐ भारत के वीरों, न्याय की आस न कोई खोए।
— विजय शर्मा 'एरी'