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माँ एक वरदान

Vijay Erry

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस भाव को केंद्र में रखकर माँ को केवल वात्सल्य की प्रतिमा नहीं, बल्कि परमात्मा का जीवंत अंश, प्रेम का सागर और अन्याय के सामने ज्वाला मानते हुए कविता प्रस्तुत है।
        
                                                    
                            
माँ — परमात्मा का अंश
माँ — परमात्मा का अंश
माँ केवल एक शब्द नहीं,
सृष्टि का आधार है माँ,
परमात्मा ने स्वयं को बाँट दिया,
उसका सुंदर साकार है माँ।
जिस घर में माँ हँस देती है,
वहाँ खुशियों के फूल खिलें,
उसकी ममता की छाँव मिले तो,
दुख के बादल दूर मिलें।
यदि दुनियावी माँ को मिल जाएँ,
परमात्मा की सारी शक्तियाँ,
सौ वर्ष से भी लंबी हो जाए,
उसके जीवन की ये युक्तियाँ।
फिर कितने झगड़े मिट जाएँगे,
कितने घर फिर बस जाएँगे,
कितने भूले राह पकड़ेंगे,
कितने आँसू हँस जाएँगे।
माँ यदि दुनिया को समझाए,
नफरत की दीवारें टूटें,
जाति-धर्म के नाम पर जितने,
झगड़े हैं, वे सारे छूटें।
भाई भाई को गले लगाए,
बेटी को सम्मान मिले,
हर निर्धन के सूने आँगन में,
रोटी और मुस्कान खिले।
माँ प्यार का गहरा सागर है,
जिसकी थाह नहीं कोई,
उसकी गोदी में सिर रखकर,
रो लेता है मन का रोई।
उसके आँचल की छाया में,
डर भी अपना दम खो देता,
माँ का हाथ सिरहाने हो तो,
दर्द भी धीरे-धीरे सोता।
लेकिन माँ केवल प्यार नहीं,
वह शक्ति की पहचान भी है,
अन्याय देखकर चुप न रहे जो,
वह माँ की दूसरी आन भी है।
जिसमें ममता अमृत बनती,
वहीं क्रोध ज्वाला बनता है,
बच्चे पर संकट आ जाए तो,
माँ स्वयं तूफान बनता है।
माँ की आँखों में करुणा है,
पर अन्याय पर आग भी है,
उसकी ममता फूलों जैसी,
उसकी चेतावनी नाग भी है।
जो सीमा लाँघे अपनेपन की,
माँ उसको समझाती है,
जरूरत पड़े तो प्रेम की माँ,
दुर्गा भी बन जाती है।
काश विश्व की हर माँ को,
इतनी लंबी उम्र मिले,
वह सौ वर्ष से आगे जीकर,
सौ पीढ़ियों को ज्ञान मिले।
बच्चों को केवल धन न दे वह,
सच्चे संस्कारों की थाती दे,
जीवन जीने की कला सिखाए,
और मानवता की सौगात दे।
न राजा माँ से बड़ा जगत में,
न कोई पद माँ से ऊँचा,
उसके चरणों में जो झुक जाए,
उसका मन हो जाए सच्चा।
मंदिर-मस्जिद खोजे जग जिसको,
वह घर में बैठी मिल जाती,
परमात्मा का अंश है माँ,
जो प्रेम बनकर मुस्काती।
हे माँ! तुझमें ईश्वर बसता,
तू ही शक्ति, तू ही दया,
तू ही जीवन की पहली गुरु है,
तू ही प्रेम की पहली छाया।
तेरे जैसा बन जाए मानव,
संसार सुधरता देर न होगी,
हर घर में यदि माँ जाग उठी,
तो धरती स्वर्ग से कम न होगी।
माँ को प्रणाम — उस परम शक्ति को प्रणाम,
जो प्रेम भी है, करुणा भी है और आवश्यकता पड़ने पर न्याय की ज्वाला भी।
रचनाकार: विजय शर्मा ऐरी, अजनाला, अमृतसर
मौलिकता प्रमाण-पत्र: इस रचना का मूल भाव, विचार और विषय रचनाकार के अपने हैं। रचना को शब्दबद्ध और साहित्यिक रूप देने में AI की सहायता ली गई है।
ईमेल: विजय शर्मा ऐरी का संपर्क ईमेल
एक महीने पहले
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