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फूल पर बैठी हुई तितलियां उड़ाते हैं

विशाल ओझा

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम हैं मज़दूर मगर घर नहीं बनाते हैं
        
                                                    
                            
सिर्फ़ कम्प्यूटरों पे उँगलियाँ फिराते हैं

इतनी फ़ुरसत ही कहाँ, होंगे और लोग वो जो
फूल पर बैठी हुई तितलियां उड़ाते हैं

उनका घर लौटना दफ़्तर में होने जैसा है
लौटते वक़्त भी दफ़्तर जो साथ लाते हैं

ऐसे लोगों से न आएगा इंकलाब-ए-जहां
जो 'जगे' दिल को भी दे थपकियाँ सुलाते हैं

हम उसी मुल्क में रहते हैं, हुक्मरान जहाँ
फूँक देते हैं नगर आग फिर बुझाते हैं

ऐसे लोगों में नहीं होना है शुमार हमें
शे'र कहते हैं जो शायर नहीं कहाते हैं

'मीर' साहब से मुहब्बत किसे नहीं 'एहसास'
हम तो 'ग़ालिब' के मगर पीछे- पीछे आते हैं
- विशाल ओझा 'एहसास'
5 घंटे पहले
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