हम हैं मज़दूर मगर घर नहीं बनाते हैं
सिर्फ़ कम्प्यूटरों पे उँगलियाँ फिराते हैं
इतनी फ़ुरसत ही कहाँ, होंगे और लोग वो जो
फूल पर बैठी हुई तितलियां उड़ाते हैं
उनका घर लौटना दफ़्तर में होने जैसा है
लौटते वक़्त भी दफ़्तर जो साथ लाते हैं
ऐसे लोगों से न आएगा इंकलाब-ए-जहां
जो 'जगे' दिल को भी दे थपकियाँ सुलाते हैं
हम उसी मुल्क में रहते हैं, हुक्मरान जहाँ
फूँक देते हैं नगर आग फिर बुझाते हैं
ऐसे लोगों में नहीं होना है शुमार हमें
शे'र कहते हैं जो शायर नहीं कहाते हैं
'मीर' साहब से मुहब्बत किसे नहीं 'एहसास'
हम तो 'ग़ालिब' के मगर पीछे- पीछे आते हैं
- विशाल ओझा 'एहसास'
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