बात बतावत रह गईनी।
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बात बतावत रह गईनी।
प्यार जतावत रह गईनी।
रहिआ से लोगवा के हम,
कांट हटावत रह गईनी।
फूल-फूल में भेद होला,
हम समझावत रह गईनी।
रोड के अरिआ छेहां खाति,
गाछ लगावत रह गईनी ।
सुतल अ कोहनाइल मन में,
प्रेम जगावत रह गईनी ।
जब-जब दीया ज्ञान के बुतल,
दीप जरावत रह गईनी।
सूनापन संगीत म बदले
साज बजावत रह गईनी।
जग के कम रौनक न होखे,
जगत सजावत रह गईनी।
केहू आखिर आके देखे,
का कईनी अ का धईनी,
मन के हर कोना कोना प,
गीत कढ़ावत रह गईनी।
-विजय कुमार पाण्डेय 'प्यासा'