इटावा स्टेशन के पास, 'घोड़ा चाय' नामक दुकान पर आज ख़ास अंजुमन,
रात के सफ़र की थकावट, चाय की रौनक़ में हो गई बेवतन।
ट्रेन बदलने का एक घंटा, इंतजार में यूं लिपटा,
अंगीठी की आंच पर दमकती, अदरक की चाय ने सुकून दिया।
बन में अमूल बटर की मिठास, जैसे हो गया हो दीदार-ए-सहर,
बारिश की बूंदें, सफर की हदों को कर रही थी बेअसर।
चाय की लज़्जत, खुशबू, दिल की गहराईयों को छू गई,
कुल्हड़ की सौंधी खुशबू से, सफर की हर थकान रूह से उतर गई।
कोयले की अंगीठी पर दूध का दहकता मंजर था,
सुनहरे दूध में चाय की अदावत का नया असर था।
गुप्ता जी ने सौ साल पुरानी इस चाय की नफासत को यूं उकेरा,
पंद्रह रुपए की लज्जत में, इस चाय में बस गया ये मन मेरा।
अब बारी थी बन मक्खन की, कारीगर जी ने हुनर दिखाया,
तारों वाले चौकोर जाल में कैद कर, कोयले की आंच से सुनहरा बनाया।
बीच से काटकर अमूल का मक्खन भरा, नम आंच में घुलाया,
काला नमक छिड़क, दोने में परोसा, चाय साथ 'वैभव' ने एक नया जश्न मनाया।
- वैभव पोरवाल