आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वह एक चाय की दुकान

                
                                                         
                            इटावा स्टेशन के पास, 'घोड़ा चाय' नामक दुकान पर आज ख़ास अंजुमन,
                                                                 
                            
रात के सफ़र की थकावट, चाय की रौनक़ में हो गई बेवतन।
ट्रेन बदलने का एक घंटा, इंतजार में यूं लिपटा,
अंगीठी की आंच पर दमकती, अदरक की चाय ने सुकून दिया।

बन में अमूल बटर की मिठास, जैसे हो गया हो दीदार-ए-सहर,
बारिश की बूंदें, सफर की हदों को कर रही थी बेअसर।
चाय की लज़्जत, खुशबू, दिल की गहराईयों को छू गई,
कुल्हड़ की सौंधी खुशबू से, सफर की हर थकान रूह से उतर गई।

कोयले की अंगीठी पर दूध का दहकता मंजर था,
सुनहरे दूध में चाय की अदावत का नया असर था।
गुप्ता जी ने सौ साल पुरानी इस चाय की नफासत को यूं उकेरा,
पंद्रह रुपए की लज्जत में, इस चाय में बस गया ये मन मेरा।

अब बारी थी बन मक्खन की, कारीगर जी ने हुनर दिखाया,
तारों वाले चौकोर जाल में कैद कर, कोयले की आंच से सुनहरा बनाया।
बीच से काटकर अमूल का मक्खन भरा, नम आंच में घुलाया,
काला नमक छिड़क, दोने में परोसा, चाय साथ 'वैभव' ने एक नया जश्न मनाया।
- वैभव पोरवाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर