ये जो मैं यूँ खुद से नजरें छुपा भाग आया हूँ,
जाने क्या कुछ नहीं मैं पीछे गवाँ आया हूँ।
वो जो एक शख्स बसता था मुझमें कभी,
आज उसी का जनाज़ा उठा आया हूँ।
एक दौर था जब आसमां को छूना मेरी आदत थी,
हर बुलंदी मेरी ज़िद, हर जीत मेरी इबादत थी।
आज टूट कर बिखर गया हूँ इस तरह ज़मीन पर,
कि अपने ही बिखरे हुए काँच से नजरें चुरा आया हूँ।
कल तक जो शान थी, जो ग़रूर था मेरे आलम का,
आज वही वजूद एक बे-नाम सा साया बन गया।
हवाओं से शर्त लगाने वाला वो जो जुनून था,
आज उसी जुनून को खामोशी के सुपुर्द कर आया हूँ।
नहीं बचा अब मुझमें वो पहले वाला आफत का समंदर,
एक खाली सेहरा है अब मेरी रूह के अंदर।
जो कभी चट्टान बन कर खड़ा रहता था तूफान के आगे,
आज उसी वजूद की राख को हवा में उड़ा आया हूँ।
जो कभी शिखर पर ताज पहन कर बैठा करता था,
अपने ही जुनून की धार पे जो आगे बढ़ता था।
आज गहरी खाइयों की ज़मीन में ऐसा धँस गया हूँ,
कि बुलंदियों से आने वाली रोशनी से भी डर आया हूँ।
पहले तो सिर्फ जमाने की नजरों से बचना था मुश्किल,
अब तो खुद की आँखों में देखना बन गया है कातिल।
न किसी गैर से, न आइने से नजरें मिलाने की औकात रही,
खुद अपनी ही नजरों में इतना नीचे गिर आया हूँ।
जिन आँखों में कभी दुनिया जीतने के ख्वाब हुआ करते थे,
आज उन्हीं आँखों में शर्म का एक कतरा छुपा आया हूँ।
वो जो कभी मिसाल था अपनी शान-ओ-शौकत का,
आज उस ताज को मिट्टी में मिला कर, बिल्कुल अकेला लौट आया हूँ।