ये अक्स सी नुमा मुस्तकिल रिवायत है,
जाने दो इसको लिहाज़-ए-ख़ुशगवारी तक।
ये इंतिहाई ज़ुल्म-ए-शुमार रिवायत है,
जाने दो इसको लिहाज़-ए-ख़ुशगवारी तक।
ये इम्तियाज़-ए-रिवायत को,
दस्तक देने दो अना-परस्तों तक।
वही दास्तान-ए-रिवायत जो सदियों से लोगों
की अना बतौर शुमार होती आ रही है,
जाने दो इसको चश्म-ए-मुरव्वत तक।
जो रिवायत बनी अना-परस्तों की रस्सी, जिसने
हुस्न-ए-शुमार बशर को ज़िंदा ख़त्म कर दिया है,
ख़त्म हो जाने दो उसको अब रसीद-ए-अज़ियत तक।
अब जीने दो उनको जिनकी पहचान-ए-दास्ताँ
को क़त्ल कर दिया गया है,
ज़िंदगी-ए-दस्तक देने दो उन्हें, लिहाज़-ए-
ख़ुशगवारी में उनके अक्स आने दो।