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*संघर्ष की नदी से निकली हूँ मैं*

usha shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
        
                                                    
                            
तो आँखों में ठहर जाती हैं
संघर्ष की नदियाँ,
कष्टों के पहाड़,
और वो दिन…
जब एक-एक रोटी के निवाले के लिए
पेट की तड़पन से लड़ती थी मैं।

कभी इच्छाएँ छोटी नहीं थीं,
बस जेब में सामर्थ्य कम थी,
कभी सपने कम नहीं थे,
बस हालातों में थोड़ी नमी कम थी।

फिर मैंने वक्त से कहा—
तू चाहे जितना आज़मा ले,
मैं हार नहीं मानूँगी,
हर आँसू को अपनी ताकत बनाऊँगी,
हर ठोकर से आगे बढ़ना सीखूँगी।

ऊषा मेहनत करती रही,
खामोशी से चलती रही,
और एक दिन वही मेहनत
मेरी जिंदगी की सीढ़ी बन गई।

आज उस सीढ़ी पर खड़ी हूँ,
जहाँ जरूरत हो या चाहत,
जो मन कहता है,
उसे खरीदने से पहले
सौ बार सोचना नहीं पड़ता।

लेकिन आज भी
मैं अपनी खुशियों का शोर नहीं करती,
किसी के सामने अपनी समृद्धि
का हिसाब नहीं रखती।

मुझे किसे बताना है
कि माँ लक्ष्मी की कृपा है मुझ पर?

मेरे घर की रौनक बता देती है,
मेरी आँखों की शांति बता देती है,
मेरी आत्मनिर्भरता बता देती है
कि मैंने क्या पाया है।

क्योंकि जिसने अभाव देखे हों,
वह दौलत का प्रदर्शन नहीं करता,
वह हर सुख को
ईश्वर का आशीर्वाद समझकर जीता है।

आज जो कुछ मेरे पास है,
उसमें मेरी मेहनत भी है,
मेरे आँसू भी हैं,
मेरी रातों की जाग भी है,
और भगवान का आशीर्वाद भी।

कल तक जिस रोटी के लिए
पेट तड़पता था,
आज उसी अन्न को
सम्मान से खिलाने की ताकत है।

कल तक जो सपना
सिर्फ आँखों में था,
आज वही मेरी जिंदगी है।

*इसलिए मुझे अपनी किस्मत पर घमंड नहीं,
अपने संघर्ष पर गर्व है।*
क्योंकि मैं वहाँ नहीं पहुँची
जहाँ मुझे किसी ने पहुँचाया हो…
*मैं वहाँ पहुँची हूँ
जहाँ मेरी मेहनत मुझे लेकर आई है।*

और यही मेरी सबसे बड़ी दौलत है।
यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।
यही भगवान की
मेरे जीवन पर सबसे सुंदर कृपा है।
-ऊषा शुक्ला
5 घंटे पहले
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