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सच्ची समृद्धि

usha shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धन-दौलत तो बहुत कमाई,
        
                                                    
                            
महल बनाए, तिजोरी भर आई,
पर मन ने एक दिन प्रश्न किया—
*“क्या बस इतना ही जीवन है?”*
कल तक हाथ उठते थे लेने को,
आज मन करता है देने को,
कल तक सहारे की चाहत थी,
आज किसी का हाथ थामने को।

जो पाया, वह मेरा अकेला नहीं,
मेहनत थी, पर सफर अकेला नहीं,
माँ की दुआ, पिता का आशीष,
गुरु का ज्ञान—कुछ भी अपना अकेला नहीं।
इसलिए अब जो पास है मेरे,
उसमें कुछ हिस्सा हो औरों के हिस्से,
किसी की आंखों में उम्मीद जगे,
किसी के जीवन में उजाला दिखे।

किसी बच्चे की किताब बनूँ,
किसी की शिक्षा का जवाब बनूँ,
किसी युवा को राह दिखाऊँ,
किसी गिरे हुए को उठाऊँ।
किसी उदास चेहरे की मुस्कान बनूँ,
किसी अकेले का अरमान बनूँ,
किसी के दुख में साथ खड़ा रहूँ,
किसी की हिम्मत की आवाज बनूँ।

क्यों गिनूँ कि मैंने कितना पाया,
क्यों सोचूँ किसने क्या लौटाया,
देने में जो सुख मिल जाता है,
वह सुख धन ने कभी नहीं दिलाया।
तिजोरी भरने से क्या होगा,
यदि दिल खाली रह जाएगा,
बड़ा मकान भी छोटा लगेगा,
यदि उसमें अपनापन न आएगा।

*सच्ची समृद्धि सोने में नहीं,
किसी की जिंदगी संवारने में है,
ऊँचा उठने की खुशी क्या,
यदि कोई साथ न चढ़ने पाए।*
जीवन की सबसे बड़ी कमाई,
न नोटों में है, न गहनों में,
वह बसती है उन दुआओं में,
जो मिलती हैं सच्चे कर्मों से।

कल जब जीवन की शाम ढले,
और पीछे मुड़कर देखूँ मैं,
तो बस इतना गर्व रहे मन में—
*“मैंने केवल लिया नहीं,
अपनी सामर्थ्य से कुछ दिया भी है।”*
यही मेरी पहचान रहे,
यही जीवन का सम्मान रहे,
मेरे होने से किसी का जीवन
थोड़ा बेहतर, थोड़ा आसान रहे।
क्योंकि— *लेने वाले हाथ बहुत देखे,
अब देने वाला हाथ बनना है,
धनवान तो दुनिया बना देगी,
मुझे दिल से इंसान बनना है।*
 
एक दिन पहले
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