मां जब दुनिया में नहीं रहती
उस पर एक मार्मिक रचना
माँ
द्वार तुम्हारे जब हम आए
तब तुम नहीं रहीं माँ
भारी मन में पीड़ा व्यापी
किससे कौन कहे
तुम होती तो राह तकती
द्वार खड़ी मिल जाती माँ।
कुशल क्षेम सबके पूछती
तुम हमसे बतियाती माँ।
घर की तुम रौनक थी मां
तुम बिन हृदय दहे।
भारी मन में पीड़ा व्यापी
किससे कौन कहे।
सौम्य सुंदर गंभीर चेहरा
आंखों में झूल रहीं।
आते जाते खडी मिलती थी
मुझको नहीं भूल रहीं।।
आया है सो जायेगा एक दिन
ये सच है लेकिन।
तुम्हारा अच्छा बुरा बताना
याद आता है गिन गिन।
तुम इंतजार करती रही मां
मगर हम नहीं पहुंच पाये।
अंतिम बार देख लेते जी भर
रह रहकर हम पछताये
हलषष्ठी का दिन था उस दिन
भीड़ बहुत थी बाजारों में।
इसलिए हम नहीं आ पाये
ढूंढ रहे तुझे माँ अब तारों में।
उषा अग्रवाल
मंडला
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