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यादों का सुकूत

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहकहो का था माहौल जहाँ,
        
                                                    
                            
दिन रात मजे से कटते थे ।
वहाँ सुकूत ने सरेआम आज,
अड्डा जमा रखा है।

कोई कूच कर गया इस जहाँ से,
कोई बस गया दूर; जाके यहाँ से।
कुछ का कोई पता ही नहीं है,
तो रूठ गया कोई कारवाँ से ।

दिल में बहता लहू,
सन्नाटे में शोर करता है ।
पूछता है दिल से कहाँ है वो यार,
जिन से दिल का तूफान उठता है।

कैम्पस का,वो हँसना-हँसाना ।
रास्तों पे बेफ़िक्र,मस्तियाँ उड़ाना।
चाय की गुमटी पर पुलिस से झगड़ना,
जेब खाली पर शाह सा अकडना।

मौसम के बदलते ही,
सब मंज़र बदल गए हैं ।
रेशम से मुलायम जो थे,
वो दिल भी पत्थर बन गए हैं।

ख़ाली डगर पे बिखरा पड़ा है,
बस सूखे पेड़ों का साया,
नज़र नहीं आता उफूक पर भी,
मेरे यारों का साया।

जीवन के आख़िरी पड़ाव पे आकर,
उन्हीं सूनी गलियों में है वापस जाना।
तन्हाई की चादर बिछी है वहाँ तो
जाने कहाँ खो गया वो ज़माना !

कोई तो बता दे कहाँ हैं वो साथी,
किस तरह इस बुढ़ापे में जीऊँ?
पुरानी यादों के गुबार को लेकर,
कब तक तन्हाई का जहर मैं पीऊँ?

 
11 घंटे पहले
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