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विदुर का अकेला सत्य

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                            हस्तिनापुर की सभा में
        
                                                    
                            
कुर्सियाँ बहुत थीं—
पर सत्य के लिए
केवल विदुर खड़े थे।
राजा के पास
आँखें नहीं थीं।
दरबारियों के पास थीं—
पर वे देखना नहीं चाहते थे।
दुर्योधन कहता—
“सब हमारे साथ हैं।”
विदुर जानते थे—
सब साथ नहीं,
पद के पास हैं।
हर निर्णय पर
तालियाँ बजती थीं—
कुछ भय से,
कुछ लाभ के लिए,
कुछ अगली पदोन्नति की आस में।
विदुर की हथेली
अकेली रह जाती थी—
क्योंकि सत्य के पक्ष में
तालियाँ नहीं,
साहस चाहिए।
धृतराष्ट्र पूछते—
“इससे मेरे पुत्र का
क्या हित होगा?”
विदुर कहते—
“जो संस्था का हित नहीं,
वह उत्तराधिकारी का हित
कैसे होगा?”
लेकिन पुत्र-मोह
हर तर्क से बड़ा था।
योग्यता बाहर खड़ी थी,
अपना आदमी भीतर बैठा था।
नियम दीवार पर थे,
निर्णय रिश्तों पर—
दरबार चलता रहा
आज के किसी कार्यालय की तरह।
जहाँ अध्यक्ष कहता है—
“अपनी बात खुलकर रखिए।”
कर्मचारी पहले चेहरे पढ़ता है,
फिर अपनी बात बदल देता है।
पासों की खनक में
विदुर ने विनाश सुन लिया था।
उन्होंने कहा—
“यह खेल नहीं,
विश्वास की हार है।”
पर दरबार को लाभ दिखा,
जोखिम बताने वाला
नकारात्मक कहलाया।
आज भी बैठक में
सब लक्ष्य पर ‘हाँ’ कहते हैं।
एक व्यक्ति पूछता है—
“किस कीमत पर?”
और उसी क्षण
उसकी वार्षिक समीक्षा
लिखी जाने लगती है।
द्रौपदी ने न्याय माँगा,
महायोद्धा चुप बैठे रहे।
पद था, शक्ति थी—
नैतिक साहस नहीं था।
आज भी अन्याय पर
निजी संदेश आता है—
“हम आपके साथ हैं।”
खुली बैठक में वही लोग कहते हैं—
“हमें पूरे तथ्य
मालूम नहीं हैं।”
सत्य फिर
अकेला रह जाता है।
विदुर को
‘कठिन व्यक्ति’ कहा गया—
यही कार्यालय की राजनीति है।
जो सच बताए,
वह असहयोगी।
जो हर बात पर मुसकराए,
वह टीम का खिलाड़ी।
जो खतरा दिखाए,
वह निराशावादी।
जो आँकड़े सजाए,
वह दूरदर्शी।
विदुर कहते रहे—
“संकट बाहर नहीं,
आपके निर्णयों के भीतर है।”
पर राजा ने
संदेश सुनने के बजाय
संदेशवाहक को दोष दिया।
आज भी घाटा छिपा रहता है,
सच की भाषा पर
प्रश्न उठते हैं।
एक दिन
अपमान सीमा पार कर गया।
विदुर ने महल छोड़ दिया—
वे पद से गए थे,
पर पराजित नहीं।
हस्तिनापुर में
बहुत लोग रह गए—
पर विवेक
उनके साथ चला गया।
आज भी योग्य व्यक्ति
कंपनी बाद में छोड़ता है—
पहले विश्वास,
फिर उम्मीद,
अंत में पहचान-पत्र।
प्रबंधन कहता है—
“वह हमारी संस्कृति में
फिट नहीं था।”
कोई नहीं पूछता—
जिस संस्कृति में सत्य न समाए,
क्या वह संस्कृति
बचने योग्य थी?
कुरुक्षेत्र
एक दिन में नहीं बना था।
वह हर उस बैठक में बन रहा था
जहाँ सत्य दबाया गया,
हर उस पदोन्नति में
जहाँ योग्यता हारी,
हर उस मौन में
जहाँ अन्याय जीत गया।
आज कंपनियाँ
महाभारत से बचना चाहती हैं—
पर अपने विदुर को
बोलने नहीं देतीं।
वे नीतियाँ बनाती हैं,
मूल्यों के पोस्टर लगाती हैं—
लेकिन असहमति को
अनुशासनहीनता मानती हैं।
याद रखिए—
संस्था उस दिन नहीं गिरती
जब उसका लाभ घटता है।
उसका पतन उस दिन शुरू होता है
जब सच बोलने वाला अकेला पड़े
और चापलूसी
सामूहिक निर्णय कहलाए।
हर कार्यालय में
एक धृतराष्ट्र है—
जो सुविधा से
आँखें मूँदता है।
एक दुर्योधन है—
जो पद को विरासत समझता है।
एक शकुनि है—
जो आँकड़ों के पासे फेंकता है।
और कहीं
एक विदुर भी है—
न अपना गुट,
न ऊँचा पद,
केवल सत्य।
इसीलिए
वह अकेला है।
पर इतिहास जानता है—
सभा ने भले विदुर को न माना,
समय ने हर बार
उन्हीं को सही ठहराया।
यदि किसी बैठक में
एक आवाज़ अकेली हो,
उसे तुरंत गलत मत मानना।
संभव है—
वह विरोध नहीं,
संस्था का बचा हुआ
अंतिम विवेक हो।
क्योंकि हर युग में
सत्य के पास भीड़ नहीं होती—
कभी उसका नाम विदुर होता है,
और कभी
आपके कार्यालय में बैठा
वह शांत कर्मचारी—
जिसकी बात आज नहीं सुनी गई,
पर जिसका लिखा हुआ
कल कंपनी का
अंतिम बयान होगा॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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