राम नाम के बीज से हुआ राम का उदय,
कण-कण में राम बसे हुई राम की जय।
हुई राम की जय धरती पर हुआ उजाला
जीवन में जैसे किसी ने अमृत मिला डाला।।
अक्षय कोटि नमन हो हो तुम अक्षरधाम,
जमदग्नि के पुत्र तुम हो रेणुका के तुम राम।
सूर्य तुममें बसा है घटा अति घोर घनश्याम,
हाथ परसा होने से नाम पड़ा फिर परशुराम।।
पितृभक्ति में प्रसिद्ध हुए हुए शास्त्र निपुण,
देव तुल्य जीवन से प्रसन्न हुए पित्र पूर्ण।
सहस्त्रबाहु की कुंठा ने अत्याचार किया घोर,
कामधेनु को प्राप्त करने हित बन गया वो चोर।।
बन गया वह चोर घोर कर्म जब उसने कर डाला,
उस भृगु वंशी ने उसके वध का प्रण कर डाला।
हुआ घोर संग्राम पित्र भक्ति परशुराम ने दिखाई
सहर्ष अक्षोणी सेना परशुराम ने फिर मार गिराई।।
इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन धरा को कर डाला,
परशुराम ने अपने मृत पिता का बदला ले डाला।
चहुंओर लहू की धारा पानी समान तब बहती थी,
क्षत्रिय वीरों की स्त्रियां पतियों की खैर मनाती थीं।।
ऋषि महर्षि तब फिर परशुराम के निकट जाते हैं,
इस महाविनाश को रोकने हित उन्हें समझाते हैं।
तब परशुराम युद्ध छोड़ महेंद्र पर्वत चले जाते हैं
अपना शिव धनुष फिर जनक को सौंप जाते हैं।।
कठोर तप के कारण शिव प्रिय वो बन जाते हैं,
सप्त चिरंजीवियों में परशुराम भी गिने जाते हैं ।
जीवन का सच्चा सार परशुराम ही हमें बताते हैं
भगवान विष्णु के अवतार परशुराम माने जाते हैं।।
जो भी सच्चे मन से परशुराम की सेवा करता है,
उसके संकट परशुराम हरपल दूर करते जाते हैं।
ब्रह्म कर्म के साथ क्षत्रिय धर्म भी हमें सिखाते हैं
हर अस्त्र शस्त्र का ज्ञान परशुराम सहर्ष दे जाते हैं।।
भीष्म द्रोण और कर्ण परशुराम शिष्य माने जाते हैं,
वीरों में महावीर और महा तपस्वी रूप जाने जाते हैं
जो इनकी सेवा करते ओज तेज से वे भर जाते हैं,
हर कुमंगल को वे सुमंगल में सहर्ष बदल जाते हैं।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय