स्वरचित -- राकेश कुमार तिवारी
:::::::::::::::::;::;:::::::::::::::::::::::::::;;;
:
तेरी रंगत के आगे ये कलियां है क्या
हर नज़ाकत में बिखरा तेरा नूर है।
देख पाता नहीं आंख भर के तुझे
क्या करूं दिल मेरा कितना मजबूर हैं।
पास होकर भी छूने से डरता हूं मैं
ये भी शायद मोहब्बत का दस्तूर है।
मुस्कुरा कर जो देखा तूने एक दफा
अब तो लगता है बंदा ये मशहूर है।।।।