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गरीबी पर कविता

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गीत रोटी के लिखे मैंने, नाश्तों का पता नहीं है
        
                                                    
                            
चल पड़े हैं दौर में अब, रास्तों का पता नहीं है
हर गली हर राह में, दर्द के मारे खड़े हैं
आज के नेता अपने, झूठे वादों पर अड़े हैं
रो हुठी है ये धरा फिर,अश्क भी लगे जो बहने
गीत रोटी के लिखे मैंने, नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब ,रास्तों का पता नहीं है
ये सफलता ये विफलता ,ये कठिनता की कहानी
आंखों में आसूं बसे हैं , बेरूखी है जिंदगानी
हर जुबां पे रोटी लिखी है,बेबसी लगी फिर भी सहने
गीत रोटी के लिखे मैंने नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब रास्तों का पता नहीं है
जंग हो जज्बातों को लेकर प्रेम की बारिश कहां है
दिल्ली के संसद में देखो , पैसों की बारिश जहां है
दिल की चोटों को दबाकर,जनता ने तन पे फटे लिवाज पहने
गीत रोटी के लिखे मैंने, नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब,रास्तों का पता नहीं है
हौंसले अरमानों में छिपे हैं,जिद जुनूनों में समायी
शर्मिंदगी को पार कर नर ने, कुत्तों की भी रोटी छिनाई
लिख गरीबी की कहानी,जा रहा रमजानी कहने
गीत रोटी के लिखे मैंने,नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब, रास्तों का पता नहीं है
3 घंटे पहले
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Shivam Awasthi

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