आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गरीबी पर कविता

                
                                                         
                            गीत रोटी के लिखे मैंने, नाश्तों का पता नहीं है
                                                                 
                            
चल पड़े हैं दौर में अब, रास्तों का पता नहीं है
हर गली हर राह में, दर्द के मारे खड़े हैं
आज के नेता अपने, झूठे वादों पर अड़े हैं
रो हुठी है ये धरा फिर,अश्क भी लगे जो बहने
गीत रोटी के लिखे मैंने, नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब ,रास्तों का पता नहीं है
ये सफलता ये विफलता ,ये कठिनता की कहानी
आंखों में आसूं बसे हैं , बेरूखी है जिंदगानी
हर जुबां पे रोटी लिखी है,बेबसी लगी फिर भी सहने
गीत रोटी के लिखे मैंने नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब रास्तों का पता नहीं है
जंग हो जज्बातों को लेकर प्रेम की बारिश कहां है
दिल्ली के संसद में देखो , पैसों की बारिश जहां है
दिल की चोटों को दबाकर,जनता ने तन पे फटे लिवाज पहने
गीत रोटी के लिखे मैंने, नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब,रास्तों का पता नहीं है
हौंसले अरमानों में छिपे हैं,जिद जुनूनों में समायी
शर्मिंदगी को पार कर नर ने, कुत्तों की भी रोटी छिनाई
लिख गरीबी की कहानी,जा रहा रमजानी कहने
गीत रोटी के लिखे मैंने,नाश्तों का पता नहीं है
चल पड़े हैं दौर में अब, रास्तों का पता नहीं है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर